रविवार, 1 अगस्त 2010

नायक

मौसम बदला
शीशे में दिखा
एक मुरझाया चेहरा


तपने लगी ज्वाला प्रचंड
छाँव छोटे
आँखों में कुछ चुभता सा
एक ठंढी कोठरी ढूंढ
भीत में टिका पीठ
भारी पलकें इंतजार में
सरक नहीं रही हवा
एक रोशनी की पतली रेखा
किवाड़ पार से
गिरती वक्ष पर
सामने कील से लगा एक गन्दला शीशा
दिखा उसमे एक मुरझाया चेहरा


बजा जब
रिमझिम-रिमझिम संगीत
कोई हंस रहा
चिढ़ा रहा
कर रहा अट्टहास
गल-गल कर बह रही
गांवों की कच्ची दीवारें
खेत हरे होने को ब्याकुल
बिजली चमक कर बिखर गयी
चहरे पर
और शीशे में दिखा तब
वही मुरझाया चेहरा


हवाएं हुई सर्द
कई लिहाफ में लपेटने के बावजूद
सिहर रहा तन
धूप के लिए
बिल में छुपे सब
निकल आये जहाँ-तहां
ढूंढते एक गर्म थकान
चुभती नहीं आँखों को
न ढूंढ पाने का सच
शीशे में तब दिख जाता
वही मुरझाया चेहरा

महकी जब
बसंत की मद्धम बयार
फाग के बोल
चैता की तान
अमराईयों में जब
गूंजी कोयल की कूक
एक झीनी सी खुशी
आँखों में लहराई
नज़र आया एक शीशा
और दिखा उसमे फिर
वही मुरझाया चेहरा

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