सोमवार, 19 जुलाई 2010

एक दफ्तर

बैठे रहो
सर पर घड़ों पानी उड़ेलकर
साफ-साफ कहो
की कहने का मायने है
सुनना
चुप्पी साध सुनते रहो


कार्यों का कोई अर्थ नहीं
सृजन की संभावना विलीन
पूर्ववर्ती तथ्यों में लगा जी
बस आड़ा-तिरछा रखा करो


पल-पल बदलते वक्तब्य
ढूढने की लगातार कोशिश
बावजूद उसके अंतहीन वेदना
निग्रह भूल बस ढूढ़ो और ढूढ़ो


दृश्यबंधों में परिवर्तन नहीं
कुर्सियां-मेज-अलमीरा
पुस्तकें-कलमदान-पेपरवेट
तोंद सहलाते, पेपरवेट नचाते
पैर हिलाते बस उन्हें देखा करो

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