सोमवार, 15 जून 2009

एक गीत : नंगे बच्चों के नाम

बच्चे जो नंगे
कीचड़ में रंगे हैं

देखते हैं शांत
नही पर क्लांत

मन उनका कोरा
तो क्या ! जो तन नहीं गोरा

नज़रें जब उस ओर जाती
भौहें आपकी क्यूँ सिकुड़ जातीं

सब आपके पास तो यूँ भी नहीं आते
गर आते जो हैं
आप कहाँ उनको बिठाते

जो सबकी है यह धरती
फ़िर एक् छोटे से टुकड़े पर
दौड़ लगाने से
उन्हें मार क्यूँ पड़ती

टाई बैज सज संवर
सब जाते हैं
वे कीचड़ वाले
फटी निक्करों में
घुन्सरिया स्कूल भी क्यूँ नही आते

एक गीत
जिसमे लम्बाती शामें हैं
चाँदनी रातें हैं
जाड़े की धूप है
बारिश के बूंदों की रूमानियत है

जिसमे ज़िक्र नहीं उन नंगों का

तो क्या एक गीत
इनके लिए भी रच सकते हैं