रविवार, 29 अगस्त 2010

रेशमी दुपट्टा

वह रंग
जो भरा था सबने मिलकर
एक सुनहले कटोरे में

जिसकी कुछ बूंदों से
रंगीन होनी थी दुनियां

सोचा था
माटी से सने मुख
धान रोपते हुए
खुशी के गीत गायेंगे

खदानों की कालिख से
काला हुआ चेहरा
दमकेगा
मिल और कारखाने
सोना उगलेंगे
धरती खुशहाल होगी

फिर अचानक
कुछ लोगों ने
लगा लिया अपने दामन पर
कटोरे में भरा वह रंग
इतना भी न छोड़ा
जिसमे डुबो सकें
एक रेशमी दुपट्टा

कहा जरूर भरेंगे वापस
परचम लहरायेंगे

इंतजार में खो रहे अब
वे चहरे
जिसे खदान ने रंग दिया था
वो हाथ
जो मिट्टी से सने थे

पथरा रही है आँखें
राहें देख-देख
कब भरेगा वो कटोरा फिर से

लहराएगा उस रंग में डूबा
वो रेशमी दुपट्टा
प्राचीर पर

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