सुबह से शाम
फिर हुई रात
युद्ध चलता ही रहा.
ख़त्म हो जाना चाहिए
संविधान कहता है.
लड़ना है, जीतना भी
अधिपति कहता है
खेलो अपने नपे तुले बाजी.
चलता रहा यूँ ही
कई रातें तमाम
लड़ता रहा अधिपति
पलक तक नहीं झपकी.
कि एक दिन अचानक
युद्ध के मैदान से
गायब हो गया
आह!
उत्तराधिकारी न दे गया.
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