शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

पराजित अधिपति

सुबह से शाम
फिर हुई रात
युद्ध चलता ही रहा.

ख़त्म हो जाना चाहिए
संविधान कहता है.

लड़ना है, जीतना भी
अधिपति कहता है
खेलो अपने नपे तुले बाजी.

चलता रहा यूँ ही
कई रातें तमाम
लड़ता रहा अधिपति
पलक तक नहीं झपकी.

कि एक दिन अचानक
युद्ध के मैदान से
गायब हो गया
आह!
उत्तराधिकारी न दे गया.

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