1.
रोज़ गुज़रते हैं कई मुंह फेर
कहानी गढ़ते
शाम ढलने तक टीले के उस पार
सूर्य की मद्धम रोशनी निहारता
एक नन्हा तनहा बैठा है
उसकी खामोश आँखें
लम्बी होती परछाईओं के साथ
सामने वाली कंक्रीट और गारे से बनी
उस पुराने कुँए में खो जाती है
जिस ओर लोग
भूत का बसेरा जान कभी रुख नही करते
और खो जाती है सभी नकली कहानियाँ
अगले शाम के लिए
2.
शाम आई
फ़िर वही नन्हा
सड़क के किनारे टकटकी लगाये
कोई तो एक बार
हो के गुज़रेगा उससे
कोई तो छुएगा उसे
पूछेगा निःशब्द होने का सच
अपरचित होने का दर्द
परिचितों से अधिक दिखाई देता है
परछाइयों की चुभन
नीम का दामन थाम
बता देतीं खबर
पत्तियों से होकर गुजरने वाला
शीतल चाँद पार बिठा देगा
लोरी गायेगा
कहानियाँ सुनायेगा
नन्हे की निश्छल निगाहें
एकदम ठहर गयी हैं
वो नहीं जानती हैं कहानियां
वो तो घूम रही हैं
कभी टीले पार
कभी सड़क के किनारे
कभी नीम के पेड़ पर
दोनों बहुत उम्दा!! बधाई!
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