सोमवार, 12 जुलाई 2010

अँधेरे तक

राजा की पालकी
पिछले हिस्से में लगा वह
सीखने लगा है आदत ढोने का

कुछ तो आदतन
कुछ मित्रवत

कुछ देख औरों को
सीख रहे ढोना

गर्मी होती है, असह्य पर नहीं
इतनी जितने कंधे बदल सकें


पसीने की बूंदें हैं किधर ?
उनका वाष्पीकरण
या कि हो रहा संघनन

यदि हो रहा वाष्पीकरण
तो छाएंगे बादल

जल नहीं बरसेगा
बरसेगा आंसू

गर होगा संघनन
संघनित पदार्थ के अणु टकरायेंगे
फ्यूजन, विष्फोट
तब छाएंगे जो बादल नीले नभ में
वे काले न होंगे

राजा की पालकी
पीली छत्र का रंग पीला न रहेगा
राज-प्रसाद शोणित से नहाएगी
हरा, पीला, नीला, गुलाबी
कुछ न बचेगा
सिर्फ एक रंग होगा लाल

राजा चाहता है बचाना
ऊष्मा बढ़ाना
ताकि हो वाष्पीकरण
बरसे सिर्फ आंसू
नदियाँ खरे जल से भर जाएँ

राजा के घर पोखर
जहाँ डाला है एक नयी छत
वह उसका मीठा पानी पीएगा
खारा वह पी नहीं सकता
कड़वा तो पीता है आदतन

पालकी महल में रख
रात को
लौटा वह घर
बीबी और बच्चे
पिलाये तब खारा जल
भागा उस भ्रम की ओर
जहाँ धरती आकाश से एकाकार हो गयी

सुबह बिस्तर पर उसे न देख
बीबी ने बच्चे से कहा जा
लौट कर हर बार आएगा
राजा की पालकी ढोता जायेगा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें