गुलमोहर
बुधवार, 8 सितंबर 2010
रविवार, 29 अगस्त 2010
रेशमी दुपट्टा
वह रंग
जो भरा था सबने मिलकर
एक सुनहले कटोरे में
जिसकी कुछ बूंदों से
रंगीन होनी थी दुनियां
सोचा था
माटी से सने मुख
धान रोपते हुए
खुशी के गीत गायेंगे
खदानों की कालिख से
काला हुआ चेहरा
दमकेगा
मिल और कारखाने
सोना उगलेंगे
धरती खुशहाल होगी
फिर अचानक
कुछ लोगों ने
लगा लिया अपने दामन पर
कटोरे में भरा वह रंग
इतना भी न छोड़ा
जिसमे डुबो सकें
एक रेशमी दुपट्टा
कहा जरूर भरेंगे वापस
परचम लहरायेंगे
इंतजार में खो रहे अब
वे चहरे
जिसे खदान ने रंग दिया था
वो हाथ
जो मिट्टी से सने थे
पथरा रही है आँखें
राहें देख-देख
कब भरेगा वो कटोरा फिर से
लहराएगा उस रंग में डूबा
वो रेशमी दुपट्टा
प्राचीर पर
जो भरा था सबने मिलकर
एक सुनहले कटोरे में
जिसकी कुछ बूंदों से
रंगीन होनी थी दुनियां
सोचा था
माटी से सने मुख
धान रोपते हुए
खुशी के गीत गायेंगे
खदानों की कालिख से
काला हुआ चेहरा
दमकेगा
मिल और कारखाने
सोना उगलेंगे
धरती खुशहाल होगी
फिर अचानक
कुछ लोगों ने
लगा लिया अपने दामन पर
कटोरे में भरा वह रंग
इतना भी न छोड़ा
जिसमे डुबो सकें
एक रेशमी दुपट्टा
कहा जरूर भरेंगे वापस
परचम लहरायेंगे
इंतजार में खो रहे अब
वे चहरे
जिसे खदान ने रंग दिया था
वो हाथ
जो मिट्टी से सने थे
पथरा रही है आँखें
राहें देख-देख
कब भरेगा वो कटोरा फिर से
लहराएगा उस रंग में डूबा
वो रेशमी दुपट्टा
प्राचीर पर
रविवार, 1 अगस्त 2010
नायक
मौसम बदला
शीशे में दिखा
एक मुरझाया चेहरा
तपने लगी ज्वाला प्रचंड
छाँव छोटे
आँखों में कुछ चुभता सा
एक ठंढी कोठरी ढूंढ
भीत में टिका पीठ
भारी पलकें इंतजार में
सरक नहीं रही हवा
एक रोशनी की पतली रेखा
किवाड़ पार से
गिरती वक्ष पर
सामने कील से लगा एक गन्दला शीशा
दिखा उसमे एक मुरझाया चेहरा
बजा जब
रिमझिम-रिमझिम संगीत
कोई हंस रहा
चिढ़ा रहा
कर रहा अट्टहास
गल-गल कर बह रही
गांवों की कच्ची दीवारें
खेत हरे होने को ब्याकुल
बिजली चमक कर बिखर गयी
चहरे पर
और शीशे में दिखा तब
वही मुरझाया चेहरा
हवाएं हुई सर्द
कई लिहाफ में लपेटने के बावजूद
सिहर रहा तन
धूप के लिए
बिल में छुपे सब
निकल आये जहाँ-तहां
ढूंढते एक गर्म थकान
चुभती नहीं आँखों को
न ढूंढ पाने का सच
शीशे में तब दिख जाता
वही मुरझाया चेहरा
महकी जब
बसंत की मद्धम बयार
फाग के बोल
चैता की तान
अमराईयों में जब
गूंजी कोयल की कूक
एक झीनी सी खुशी
आँखों में लहराई
नज़र आया एक शीशा
और दिखा उसमे फिर
वही मुरझाया चेहरा
शीशे में दिखा
एक मुरझाया चेहरा
तपने लगी ज्वाला प्रचंड
छाँव छोटे
आँखों में कुछ चुभता सा
एक ठंढी कोठरी ढूंढ
भीत में टिका पीठ
भारी पलकें इंतजार में
सरक नहीं रही हवा
एक रोशनी की पतली रेखा
किवाड़ पार से
गिरती वक्ष पर
सामने कील से लगा एक गन्दला शीशा
दिखा उसमे एक मुरझाया चेहरा
बजा जब
रिमझिम-रिमझिम संगीत
कोई हंस रहा
चिढ़ा रहा
कर रहा अट्टहास
गल-गल कर बह रही
गांवों की कच्ची दीवारें
खेत हरे होने को ब्याकुल
बिजली चमक कर बिखर गयी
चहरे पर
और शीशे में दिखा तब
वही मुरझाया चेहरा
हवाएं हुई सर्द
कई लिहाफ में लपेटने के बावजूद
सिहर रहा तन
धूप के लिए
बिल में छुपे सब
निकल आये जहाँ-तहां
ढूंढते एक गर्म थकान
चुभती नहीं आँखों को
न ढूंढ पाने का सच
शीशे में तब दिख जाता
वही मुरझाया चेहरा
महकी जब
बसंत की मद्धम बयार
फाग के बोल
चैता की तान
अमराईयों में जब
गूंजी कोयल की कूक
एक झीनी सी खुशी
आँखों में लहराई
नज़र आया एक शीशा
और दिखा उसमे फिर
वही मुरझाया चेहरा
शुक्रवार, 23 जुलाई 2010
पराजित अधिपति
सुबह से शाम
फिर हुई रात
युद्ध चलता ही रहा.
ख़त्म हो जाना चाहिए
संविधान कहता है.
लड़ना है, जीतना भी
अधिपति कहता है
खेलो अपने नपे तुले बाजी.
चलता रहा यूँ ही
कई रातें तमाम
लड़ता रहा अधिपति
पलक तक नहीं झपकी.
कि एक दिन अचानक
युद्ध के मैदान से
गायब हो गया
आह!
उत्तराधिकारी न दे गया.
फिर हुई रात
युद्ध चलता ही रहा.
ख़त्म हो जाना चाहिए
संविधान कहता है.
लड़ना है, जीतना भी
अधिपति कहता है
खेलो अपने नपे तुले बाजी.
चलता रहा यूँ ही
कई रातें तमाम
लड़ता रहा अधिपति
पलक तक नहीं झपकी.
कि एक दिन अचानक
युद्ध के मैदान से
गायब हो गया
आह!
उत्तराधिकारी न दे गया.
सोमवार, 19 जुलाई 2010
एक दफ्तर
बैठे रहो
सर पर घड़ों पानी उड़ेलकर
साफ-साफ कहो
की कहने का मायने है
सुनना
चुप्पी साध सुनते रहो
कार्यों का कोई अर्थ नहीं
सृजन की संभावना विलीन
पूर्ववर्ती तथ्यों में लगा जी
बस आड़ा-तिरछा रखा करो
पल-पल बदलते वक्तब्य
ढूढने की लगातार कोशिश
बावजूद उसके अंतहीन वेदना
निग्रह भूल बस ढूढ़ो और ढूढ़ो
दृश्यबंधों में परिवर्तन नहीं
कुर्सियां-मेज-अलमीरा
पुस्तकें-कलमदान-पेपरवेट
तोंद सहलाते, पेपरवेट नचाते
पैर हिलाते बस उन्हें देखा करो
सर पर घड़ों पानी उड़ेलकर
साफ-साफ कहो
की कहने का मायने है
सुनना
चुप्पी साध सुनते रहो
कार्यों का कोई अर्थ नहीं
सृजन की संभावना विलीन
पूर्ववर्ती तथ्यों में लगा जी
बस आड़ा-तिरछा रखा करो
पल-पल बदलते वक्तब्य
ढूढने की लगातार कोशिश
बावजूद उसके अंतहीन वेदना
निग्रह भूल बस ढूढ़ो और ढूढ़ो
दृश्यबंधों में परिवर्तन नहीं
कुर्सियां-मेज-अलमीरा
पुस्तकें-कलमदान-पेपरवेट
तोंद सहलाते, पेपरवेट नचाते
पैर हिलाते बस उन्हें देखा करो
सोमवार, 12 जुलाई 2010
अँधेरे तक
राजा की पालकी
पिछले हिस्से में लगा वह
सीखने लगा है आदत ढोने का
कुछ तो आदतन
कुछ मित्रवत
कुछ देख औरों को
सीख रहे ढोना
गर्मी होती है, असह्य पर नहीं
इतनी जितने कंधे बदल सकें
पसीने की बूंदें हैं किधर ?
उनका वाष्पीकरण
या कि हो रहा संघनन
यदि हो रहा वाष्पीकरण
तो छाएंगे बादल
जल नहीं बरसेगा
बरसेगा आंसू
गर होगा संघनन
संघनित पदार्थ के अणु टकरायेंगे
फ्यूजन, विष्फोट
तब छाएंगे जो बादल नीले नभ में
वे काले न होंगे
राजा की पालकी
पीली छत्र का रंग पीला न रहेगा
राज-प्रसाद शोणित से नहाएगी
हरा, पीला, नीला, गुलाबी
कुछ न बचेगा
सिर्फ एक रंग होगा लाल
राजा चाहता है बचाना
ऊष्मा बढ़ाना
ताकि हो वाष्पीकरण
बरसे सिर्फ आंसू
नदियाँ खरे जल से भर जाएँ
राजा के घर पोखर
जहाँ डाला है एक नयी छत
वह उसका मीठा पानी पीएगा
खारा वह पी नहीं सकता
कड़वा तो पीता है आदतन
पालकी महल में रख
रात को
लौटा वह घर
बीबी और बच्चे
पिलाये तब खारा जल
भागा उस भ्रम की ओर
जहाँ धरती आकाश से एकाकार हो गयी
सुबह बिस्तर पर उसे न देख
बीबी ने बच्चे से कहा जा
लौट कर हर बार आएगा
राजा की पालकी ढोता जायेगा
पिछले हिस्से में लगा वह
सीखने लगा है आदत ढोने का
कुछ तो आदतन
कुछ मित्रवत
कुछ देख औरों को
सीख रहे ढोना
गर्मी होती है, असह्य पर नहीं
इतनी जितने कंधे बदल सकें
पसीने की बूंदें हैं किधर ?
उनका वाष्पीकरण
या कि हो रहा संघनन
यदि हो रहा वाष्पीकरण
तो छाएंगे बादल
जल नहीं बरसेगा
बरसेगा आंसू
गर होगा संघनन
संघनित पदार्थ के अणु टकरायेंगे
फ्यूजन, विष्फोट
तब छाएंगे जो बादल नीले नभ में
वे काले न होंगे
राजा की पालकी
पीली छत्र का रंग पीला न रहेगा
राज-प्रसाद शोणित से नहाएगी
हरा, पीला, नीला, गुलाबी
कुछ न बचेगा
सिर्फ एक रंग होगा लाल
राजा चाहता है बचाना
ऊष्मा बढ़ाना
ताकि हो वाष्पीकरण
बरसे सिर्फ आंसू
नदियाँ खरे जल से भर जाएँ
राजा के घर पोखर
जहाँ डाला है एक नयी छत
वह उसका मीठा पानी पीएगा
खारा वह पी नहीं सकता
कड़वा तो पीता है आदतन
पालकी महल में रख
रात को
लौटा वह घर
बीबी और बच्चे
पिलाये तब खारा जल
भागा उस भ्रम की ओर
जहाँ धरती आकाश से एकाकार हो गयी
सुबह बिस्तर पर उसे न देख
बीबी ने बच्चे से कहा जा
लौट कर हर बार आएगा
राजा की पालकी ढोता जायेगा
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