सोमवार, 21 जून 2010

एक लाख आदमी

रास्तों पर खामोशी
चकित करती
निस्तब्धता भेदती कलेजे को
परसों जब सूनी नहीं थी
बेजां कंक्रीट व कोलतार
देखी कुछ पहले की निस्तब्धता
कानों पर रख हथेलियां
एक खेल के बाद
पटाखों के शोर में
आनंद ले रहे सभ्रांत जन तक
यह सूचना प्रसारित हुई
मारा गया एक नौजवान
काठ के मैदान में
और घरों में बंद पाये गये एक लाख आदमी

2 टिप्‍पणियां: